Reporting Late for Work in India: An Unsolved Issue
Blog by Vinay Dadmal
Email: dadmalv2015@gmail.com
Place: Warora
Date: 07.11.2026
ENGLISH
Reporting Late for Work in India: An Unsolved Issue
India is a nation of more than a billion people. Wherever people gather, queues are common. Whether it is a government office, a government hospital, a railway reservation counter, a popular restaurant, or a well-known store, people often spend a considerable amount of time standing in line.
Personally, I prefer to stand in a queue and wait for my turn. I believe that nobody should receive a service before those who arrived earlier. Most citizens feel the same way. A queue represents equality, discipline, and respect for others.
Technology has certainly improved many public services. For example, in Railway Hospitals, patients can scan a QR code and receive a queue number for doctor appointments. On paper, this appears to be an excellent system. However, even if a patient receives Queue Number 1, the waiting time may remain long because the doctor sometimes reports late for duty. The technology works, but the human element fails.
A similar situation can be observed in some government offices where officials and staff members do not always report to work on time. Citizens reach offices early, wait patiently, and expect services to start according to schedule. When the responsible person arrives late, dozens of people lose valuable time.
This issue is often seen as a small inconvenience, but I believe it is a major problem. Every delayed arrival affects many others. People may miss work, students may miss classes, patients may suffer discomfort, and senior citizens may face unnecessary hardship.
More importantly, delayed reporting damages public trust. People sitting in positions of responsibility must understand that punctuality is not merely a personal habit. It is a public duty. Citizens judge institutions through their daily experiences. When services start late, confidence in the system gradually declines.
India aspires to become a developed nation. A strong work culture is essential for that goal. Roads, buildings, and technology alone cannot build a great nation. Respect for time is equally important.
The famous saying reminds us:
"Kal kare so aaj kar, aaj kare so ab;
Pal mein pralay hoyegi, bahuri karega kab?"
Meaning: Do tomorrow's work today and today's work now. Nobody knows what the next moment may bring.
Let us start a new time culture in India. Let us respect punctuality. Let us report for work on time. Small changes in daily habits can create a big transformation in national character.
Time respected is trust earned.
- Vinay Dadmal
हिंदी
भारत में देर से कार्यस्थल पर पहुँचना: एक अनसुलझी समस्या
भारत विशाल जनसंख्या वाला देश है। जहाँ भी लोग अधिक संख्या में होते हैं, वहाँ कतारें लगना स्वाभाविक है। सरकारी कार्यालयों, सरकारी अस्पतालों, रेलवे सेवाओं, लोकप्रिय दुकानों और होटलों में लोगों को अपनी बारी के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
मुझे स्वयं कतार में खड़ा रहना पसंद है। मेरा मानना है कि जो पहले आया है, उसे पहले सेवा मिलनी चाहिए। अधिकांश नागरिक भी यही सोचते हैं। कतार समानता, अनुशासन और दूसरों के सम्मान का प्रतीक है।
आज तकनीक ने कई सुविधाएँ प्रदान की हैं। रेलवे अस्पतालों में मरीज QR कोड स्कैन करके डॉक्टर से मिलने के लिए अपना क्रमांक प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि किसी मरीज का नंबर 1 होने के बावजूद उसे लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है क्योंकि डॉक्टर समय पर उपस्थित नहीं होते। तकनीक अपनी जगह ठीक है, लेकिन मानवीय व्यवहार व्यवस्था को कमजोर कर देता है।
इसी प्रकार कई सरकारी कार्यालयों में भी अधिकारी या कर्मचारी समय पर नहीं पहुँचते। नागरिक समय पर पहुँचकर प्रतीक्षा करते हैं, लेकिन काम शुरू होने में देर हो जाती है। इससे लोगों का समय बर्बाद होता है।
बहुत से लोग इसे छोटी समस्या मानते हैं, परंतु मेरे विचार से यह एक बड़ी समस्या है। एक व्यक्ति की देरी का प्रभाव अनेक लोगों पर पड़ता है। कोई कर्मचारी अपने कार्यालय में देर से पहुँचता है, कोई विद्यार्थी अपनी कक्षा गंवा सकता है, कोई मरीज अनावश्यक पीड़ा सह सकता है और वरिष्ठ नागरिकों को अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देर से आने की आदत जनता का विश्वास कम करती है। जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को समझना चाहिए कि समयपालन केवल व्यक्तिगत आदत नहीं बल्कि सार्वजनिक दायित्व है।
यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनना है तो अच्छी कार्य संस्कृति विकसित करनी होगी। केवल आधुनिक इमारतें और तकनीक ही पर्याप्त नहीं हैं। समय के प्रति सम्मान भी उतना ही आवश्यक है।
कबीरदास जी का प्रसिद्ध दोहा हमें प्रेरित करता है:
"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब।।"
आइए, हम सभी समय का सम्मान करें। समय पर कार्यस्थल पर पहुँचें। समय पालन को अपनी संस्कृति बनाएं। छोटी-छोटी आदतों में सुधार से समाज में बड़ा परिवर्तन संभव है।
समय का सम्मान ही विश्वास की पहचान है।
- विनय दडमल
मराठी
भारतातील कामावर उशिरा हजर होण्याची समस्या: अजूनही न सुटलेला प्रश्न
भारत हा प्रचंड लोकसंख्येचा देश आहे. त्यामुळे सरकारी कार्यालये, सरकारी रुग्णालये, लोकप्रिय दुकाने, हॉटेल्स आणि विविध सेवा केंद्रांमध्ये रांगा लागणे ही सामान्य बाब आहे.
मला वैयक्तिकरित्या रांगेत उभे राहणे आवडते. जो आधी आला त्याला आधी सेवा मिळाली पाहिजे, असे मला वाटते. बहुतेक नागरिकांचीही हीच भावना असते. रांग म्हणजे समानता, शिस्त आणि इतरांच्या अधिकारांचा सन्मान.
आज तंत्रज्ञानामुळे अनेक व्यवस्था सुधारल्या आहेत. उदाहरणार्थ, रेल्वे रुग्णालयांमध्ये QR कोड स्कॅन करून डॉक्टरांच्या भेटीसाठी क्रमांक मिळतो. पण अनेक वेळा क्रमांक 1 मिळालेला रुग्ण देखील बराच वेळ वाट पाहत बसतो कारण डॉक्टर वेळेवर उपस्थित होत नाहीत. तंत्रज्ञान योग्य असले तरी मानवी सवयी व्यवस्था निष्क्रिय करतात.
अनेक सरकारी कार्यालयांमध्येही अधिकारी किंवा कर्मचारी वेळेवर उपस्थित राहत नाहीत. नागरिक वेळेवर येतात, रांगेत उभे राहतात, पण संबंधित अधिकारी उशिरा आल्यामुळे काम सुरू व्हायला विलंब होतो. यामुळे नागरिकांचा वेळ वाया जातो.
ही समस्या किरकोळ वाटू शकते, परंतु माझ्या मते ती अत्यंत गंभीर आहे. एका व्यक्तीच्या उशिराचा परिणाम अनेक लोकांवर होतो. रुग्णांना त्रास होतो, विद्यार्थ्यांचा वेळ वाया जातो, कामगारांचे नुकसान होते आणि ज्येष्ठ नागरिकांना अधिक अडचणी सहन कराव्या लागतात.
याहून मोठी हानी म्हणजे लोकांचा विश्वास कमी होतो. जबाबदारीच्या खुर्चीत बसलेल्या व्यक्तींनी हे समजून घेतले पाहिजे की वेळेचे पालन ही फक्त वैयक्तिक सवय नसून सार्वजनिक जबाबदारी आहे.
भारताला विकसित राष्ट्र बनायचे असेल तर चांगली कार्यसंस्कृती निर्माण करावी लागेल. केवळ तंत्रज्ञान, इमारती आणि सुविधा पुरेशा नाहीत. वेळेचा आदर हा विकासाचा तितकाच महत्त्वाचा पाया आहे.
संत कबीर यांचा प्रसिद्ध संदेश आजही तितकाच लागू पडतो:
"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब;
पल में प्रलय होएगी, बहुरी करेगा कब?"
चला, आपण सर्वजण वेळेचे महत्त्व ओळखूया. वेळेवर कामावर हजर राहूया. वक्तशीरपणाला राष्ट्रीय संस्कृतीचा भाग बनवूया. छोट्या सवयींतील बदल मोठ्या सामाजिक परिवर्तनाला कारणीभूत ठरू शकतो.
वेळेचा सन्मान म्हणजे विश्वासाची कमाई.
- विनय दडमल
Warora | 07.11.2026





